Wednesday, August 1, 2012

.The Elephant And The Fly



A disciple and his teacher was walking through the forest. He asked his teacher, “Why do only a few posses a calm mind?”
The teacher spoke, “An elephant was once picking leaves from a tree. A small fly came buzzing near his ear. The elephant waved it away with long ears. The fly came again, and the elephant waved it away once more. This was repeated many times. The elephant asked the fly: ‘why are u so restless and noisy? Why can’t you stay for a while in one place?’ The fly answered: ‘I am attracted to whatever I see, hear and smell. My five senses, and everything that happens around me, pull me constantly in all directions and I cannot resist them. What is your secret? How can you stay so calm and still?’
The Elephant stopped eating and said: ‘My five senses do not rule my attention. I am in the control of my attention, I can direct it whatever I want. This helps me to get immersed  in whatever I do ,and therefore, my mind is focused and calm. Now that I am eating, I am completely immersed in eating.”
Upon hearing these words, the disciple’s eyes opened wide. He looked at his teacher and said,”I understand! My mind will be in constant unrest if my five senses, are distracting me.On the other hand If I am In the command of my five senses,I can disregard sense impressions, and my mind will be calm.”   “Yes “That’s right. Control your attention ,and you control your mind.”

रक्षा बंधन .......तब और अब ..........

भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना ..
भैया मेरे छोटी बहन को न भुलाना।
ये दिन ये त्यौहार ख़ुशी का ,
पावन जैसे नीर नदी का,
भाई के उजले माथे पे ,
बहन लगाये मंगल टीका ,
झूमे ये सावन सुहाना।

रक्षा बंधन के त्यौहार आते ही ये गाना लबों पे होता था , बचपन से ही मां से सुनती आई थी सुबह होते ही एक उत्साह होता था , तीन दिन पहले ही राखी खरीद लेती थी।  मन में आता था सबसे सुंदर राखी सजे मेरे भाइयों की कलाई पे। नए कपडे पहनने का उत्साह, और जब कभी नए कपडे नहीं मिलते तो माँ  का मजबूरी को इस तरह से समझाना कि पुराने कपड़ों में  भी   इतराना, सब कुछ आनंदित करता था  .......पिताजी बेनीराम की प्रसिद्ध इमरती  लाकर सुबह ही रख देते थे ,माता पिता के आशीर्वाद के बीच रक्षा बंधन संपन्न हो जाता था ....फिर बारी थी उपहार की .......पूछने पर कि "  क्या चाहिए राखी के बदले ?'निस्वार्थ तो नहीं था, पर स्वार्थ भी कैसा था सोच  के गुदगुदी होती है. मासूमियत  भरा जवाब होता था ...". नमकीन काजू  बेनीराम वाला और जयराम  का समोसा... "एक तरफ समोसे काजू में  हम व्यस्त ,तो दूसरी तरफ मिठाई खाने की होड़ दोनों भाइयों के बीच ...कोई किसी से कम नहीं।......अद्भुत नज़ारा होता था।...एक राखी पर एक ज़िद  और बढ़ गयी .फोटो भी खिचवाना था।......रिमझिम फुहारों के बीच उर्मी   स्टूडियो की ये फोटो   है उन पलों की।.....
अब...........
कल फिर रक्षा बंधन है..... ये गीत प्रासंगिक है और दिल गुनगुनाता भी है।
.चंदा रे, मेरे भैया से कहना ,
बहना याद करे .....
अभी बहन पराये देश बसी है....एक साल पहले तक  पोस्ट से ख़त के  साथ राखी भेज देते थे, इस उम्मीद से की राखी से पहले मिल जाये ..पर डाक व्यवस्था  व्यस्तता ,कभी कभी मिली कभी नहीं। मगर अब नेट  है..राखी मिले या नहीं ECARD  FACEBOOK  की वाल पे ज़रूर  हाजिरी देता है .......साथ में  YOU TUBE   के गानेजैसे .......इसके साथ ही बहन के पास एक चेक जरूर आ  जाता है... ......      
खैर ,मेरा ये मतलब नहीं कि आजकल रिश्ते बदल गए हैं ...मेरे उद्देश्य सिर्फ अतीत की एक झलक प्रस्तुत करना है जिससे हमारी भावी पीढ़ी आनंद ले सके ,साथ ही हम आज की इस तकनीकी युग के माध्यम से नयी पीढ़ी से जुड़ सकें क्योंकि .......
परिवर्तन ही  प्रकृति का नियम है इसे अंगीकार करना हमारा फ़र्ज़ है.......
आइये , इस पवन पर्व पर अपने भाइयों के लिए मंगल कामना करे,क्योंकिआपभी तो सहमत होंगे निम्न पंक्तियों से ........ 
मेरे भैया मेरे चंदा ,मेरे अनमोल रतन ,
तेरे बदले में  ज़माने की कोई चीज न लूँ ....
Happy Raksha Bandhan!!!!!!!!!!!!!!!!!!


...

Monday, July 30, 2012


 अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

 हिन्दी कविता के विकास में 'हरिऔध' जी की भूमिका नींव के पत्थर के समान है। स्कूल के दिनों में कविता सिर्फ एक याद करने की  होती थी जिसका भावार्थ रट के परीक्षा में  लिखना होता था ......पर अब जैसे ज़िन्दगी  का पाठ्क्रम  सामने आया तो बचपन के पृष्ट अनायास ही सामने आ गए ......निम्नलिखित कविता को बड़ी  मुश्किल से . याद किया था।आज के परिपेक्ष्य में  प्रासंगिक लगती है  .....
एक तिनका 

मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ,
एक दिन जब था मुंडेरे पर खड़ा।
आ अचानक दूर से उड़ता हुआ,
एक तिनका आँख में मेरी पड़ा। 

मैं झिझक उठा, हुआ बेचैन-सा,
लाल होकर आँख भी दुखने लगी।
मूँठ देने लोग कपड़े की लगे,
ऐंठ बेचारी दबे पॉंवों भागने लगी।

जब किसी ढब से निकल तिनका गया,
तब 'समझ' ने यों मुझे ताने दिए।
ऐंठता तू किसलिए इतना रहा,
एक तिनका है बहुत तेरे लिए। 


Wednesday, July 25, 2012

तुलसी दास जी की जयंती पर उन के चरणों में हमारा कोटि कोटि वंदन नमन

श्री राम चरित मानस एवं हनुमान चालीसा की रचना कर श्री  राम और हनुमान जी महाराज को हमारे लिए सहज करने वाले महान संत कवि श्री तुलसी दास जी की जयंती पर उन के चरणों में हमारा कोटि कोटि वंदन नमन

तुलसीदास जी का जन्म उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में स्थित राजापुर नामक ग्राम में संवत् 1554 की श्रावण शुक्ल सप्तमी के दिन हुआ था। उनके पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम हुलसी देवी था।

तुलसीदास ने  रामायण के माध्यम से  सबको एक सूत्र  मैं बंधने का महान कार्य किया ....
कुछ प्रसिद्ध दोहे आज भी प्रासंगिक हैं जैसे ...

आवत ही हर्षे नही नैनन नही सनेह!

तुलसी तहां न जाइए कंचन बरसे मेह!!

तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहु ओर!
बसीकरण एक मंत्र है परिहरु बचन कठोर!! 

तुलसी साथी विपत्ति के विद्या, विनय, विवेक!
साहस सुकृति सुसत्याव्रत राम भरोसे एक!!

काम क्रोध मद लोभ की जो लौ मन मैं खान! 
तौ लौ पंडित मूरखों तुलसी एक समान!! 

प्रभु  तरु पर, कपि डार पर ते, आपु समान!
तुलसी कहूँ न राम से, साहिब सील निदान!!

चित्रकूट के घाट पर भई संतान की भीर !
तुलसीदास चंदन घिसे तिलक करे रघुबीर!!67

तुलसी पावस के समय धरी कोकिलन मौन!
अब तो दादुर बोलिहं हमें पूछिह कौन!! 

हम ऐसे महान संत कवि एवं समाज सुधारक को पुनः नमन वंदन करते है. जय श्री राम ..जय श्री हनुमान. .....






Sunday, June 24, 2012

अविस्मरणीय सफ़र हिमाचल की वादियों में ....

कुल्लू मनाली और हनीमून का सम्बन्ध बहुत पुराना है ,हमेशा से सुनते आये थे शादी के बाद हनीमून के लिए  कुल्लू मनाली  लोग जाते हैं। सोचा तो मैंने भी था , पर हो न सका.......
आखिर शादी के 22 साल बाद ही सही हमने भी कुल्लू मनाली की ये यात्रा कर ही डाली ,रोमांटिक न होकर थोडा रोमांचक थी । ये सफ़र  इंग्लिश और हिन्दी  दोनों वाला ही था और सचमुच कभी न भूलने वाला ।
शादी की 22वी सालगिरह के दिन ही प्लान बना ,ईश्वर  की मर्जी समझ के निकल पड़े अपने चार पहिये वाहन से ।
पहला रोमांच शुरू हुआ पीछे के दोनों टायर पंचर होने से ,मगर किस्मत अच्छी थी कि मकैनिक भी पास ही मिल गया ।गारंटी देने के साथ ही उसने आत्मविश्वास जगाया कि' कोई प्रॉब्लम होने से वापस फ्री में  नया बदल देंगे ।"उसे भी आत्मविश्वाश था की हम फिर नहीं आने वाले।
अगला रोमांच फिर लुधियाना के आसपास इंतज़ार कर रहा था ...जो दो टायर रिपैर  हुए थे उनमे से एक फट गया ......चिलचिलाती धूप थी पर किस्मत ने फिर साथ दिया । मकैनिक की शॉप तो थी पर वो सो रहा था ....

डरते हुए उसे जगाया । उसने पहले पूछा ,"कहाँ से आ रहे हो ?" जब बताया की दिल्ली तो कार का नंबर पलते देख के बोला, आज कपूरथला की बहुत गाड़ियाँ मेरे पास आई " हम थोडा डर  भी गए  कहीं कोई फिर मुसीबत न हो क्योंकि हमारी कार  का पंजीकरण  कपूरथला का था ....खैर हमे उसकी रामकहानी सुनना ही था ,नींद से जगा जो था ।

अगले दिन कपूरथला पहुँच कर हमने अपनी कार की जांच करायी ,फिर दूस्रे  दिन मंडी  को निकल पड़े सोचा था चिन्तपुरनी माता का दर्शन करके निकल जायेंगे ,पर जब तक बुलावा न हो , नहीं सभव होता दर्शन ।लम्बी  लाइन थी, शाम तक मनाली पहुंचना जो था।.....अब फिर एक रोमांच सामने मिला गलती से नेशनल हाइवे की जगह हम ग्रामीण हाइवे पर पहुच गए .......कंकरीली सड़क और काफी दूर तक तकरीबन 15 किलोमीटर ...ये था इंग्लिश का सफ़र (suffer ).......वहीँ एक साइन  बोर्ड भी था "unforgettable Himachal " जैसे हमारा मज़ाक बना रहा हो । हरी भरी बर्फीली वादियों का दृश्य लुप्त हो गया था मन से।मंडी से निकले मनाली पहुंचे |अगला सफ़र रोहतांग का था ,सुबह 4 बजे निकले ,सुंदर सुहाने दृश्यों से गुजरते जा रहे थे ,पर रोमांच की कमी नहीं थी ......बर्फीली वादियों का रोमांच था ही ,पर ट्राफिक जाम का रोमांच भी था 1-2 घंटे का ......कभी नवविवाहित जोड़ों को देखती थी जहाँ उत्साह बढ़ रहा था , तो कभी खुद को जहाँ शायद bloodpressure  बढ़ रहा था ऊंचाई की वजह से...किसी  तरह ये यात्रा भी संपन्न हुई ।
अब मणिकरण के तरफ जाना था सुबह फिर निकले , 10:30 पहुँच गए थे सोचा अब शाम को 6 बजे तक  चंडीगढ़ और देर रात 11 बजे तक दिल्ली तो पहुच ही जायेंगे .......पर 6 बजे तक हम फिर longest  ट्राफिक जाम का  आनंद ले रहे थे .....वजह थी रोड रेपैरिंग ......शाम को किसी तरह जाम के चगुल से बाहर निकले ....
अगले दिन फिर अपने आशियाने मैं ही सुकून मिला।....
इस तरह कुल्लू मनाली की यात्रा संपन्न हो गयी।......




Wednesday, June 6, 2012

हिंदी सिनेमा के सौ साल .....

सौ साल के कुछ हिट संवाद ...........
देवदास 
"कौन कहता है की मैं बर्दाश्त करने के लिए पीता हूँ ,मैं तो पीता हूँ कि जिससे मैं सांस ले सकूं।" (दिलीप कुमार )





वक्त 
चिनॉय सेठ , जिनके घर शीशे के हो , वो दूसरों घर पत्थर नहीं फेका करते .....(राजकुमार )






पाकीज़ा 

"आपके पाँव देखे बहुत हसीं हैं , इन्हें जमीन पर मत उतारियेगा ,मैले हो जायेंगे ..."र (राजकुमार )




शोले 
"तेरा क्या होगा कालिया?"                     (अमजद खान )







दीवार

"मेरे पास माँ  है।......."     (शशि कपूर )








कालीचरण
'"सारा संसार मुझे लायन के नाम से जानता है "(अजीत )







शहंशाह
"रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं नाम है शहंशाह ..".(अमिताभ बच्चन )








डान

"डान को पकड़ना मुश्किल ही नहीं ,नामुमकिन है "   .(अमिताभ बच्चन )



दामिनी
"जब ये ढाई किलो हाथ किसी पे पड़ता है तो आदमी उठता नहीं ,उठ जाता है।" (सन्नी देओल )




मि. इंडिया
"मोगाम्बो खुश हुआ।." (अमरीश पुरी )







शान
"मैं शाकाल हूँ .."  (कुलभूषण खरबंदा)










विश्वनाथ
"जली को आग  कहते हैं बुझी  को राख कटे हैं,उससे जो बारूद निकले उसे विश्वनाथ कहते हैं.(शत्रुघ्न सिन्हा )









हिंदी सिनेमा के 100 साल पूरे  होने जा रहे हैं ,आज एक मुकाम पे पहुच चुका हैहिंदी सिनेमा .. .....सलाम करते हैं हम अब तक की उपलब्धियों को ..........

Tuesday, May 8, 2012

Success Of A Farmer....



 
There was a farmer who grew superior quality, award-winning corn in his farm. Each year, he entered his corn in the state fair where it won honours and prizes.
 
One year a newspaper reporter interviewed him and learned something interesting about how he grew his corn. The reporter discovered that the farmer shared his seed corn with his neighbours.
 
"How can you afford to share your best seed corn with your neighbours when they are entering corn in the competition with yours each year?" The reporter asked. "Why brother?" 
 
The farmer replied, "Didn't you know? The wind picks up pollen grains from the ripening corn and swirls it from field to field. If my neighbours grow inferior, sub-standard and poor quality corn, cross-pollination will steadily degrade the quality of my corn. If I have to grow good corn, I must help my neighbours to grow good corns too." 
 
The farmer gave a superb insight into the connectedness of life. His corn cannot improve unless his neighbours' corn also improves. So it is in the other dimensions and areas of life! 
 
Those who choose to be in harmony must help their neighbours and colleagues to be at peace. Those who choose to live well must help others live well too. The value of a life is measured by the lives it touches...
 
Success does not happen in isolation; it is most often a participatory and collective process. So share the good practices, ideas and new knowledge with your family, friends, team members and neighbours and all.